महाभारत युद्ध के बाद युयुत्सु का क्या हुआ था?

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युयुत्सु महाभारत के युद्ध के अंत में बचे हुए १८ योद्धाओं में से एक था। उसके पिता धृतराष्ट्र ही थे किंतु माता गांधारी की एक दासी थी जिसका नाम सौवली था। जब युयुत्सु का जन्म हुआ तो वो देखने से ही अत्यंत बलवान लगता था और इसी कारण उसका नाम युयुत्सु (योद्धा) रखा गया। वो दुर्योधन से छोटा और दुःशासन से बड़ा था।   महात्मा विदुर की ही भांति उसने भी जीवन भर राजपुत्र होकर भी दासीपुत्र होने का दंश झेला। हालाँकि उन्ही की भांति उसका महत्त्व भी हस्तिनापुर में बहुत था और अन्य सभासदों के लिए वो भी राजपुत्र ही था। युयुत्सु के अतिरिक्त उसे धार्तराष्ट्र (धृतराष्ट्र का पुत्र होने के कारण), कौरव्य (कुरुवंश में जन्म लेने के कारण) और वैश्यपुत्र (वैश्य स्त्री की संतान होने के कारण) भी कहा जाता है। महाभारत के युद्ध के बाद वही एकलौता कौरव जीवित था और उसी ने धृतराष्ट्र और गांधारी की मृत्यु के बाद उन्हें मुखाग्नि दी थी।   युयुत्सु कभी भी शकुनि के प्रभाव में नहीं रहा। अपने अन्य भाइयों से उलट उसका मन सदैव धर्म की ओर ही झुका था। यही कारण था कि वो दुर्योधन के किसी भी पाप में भागीदार नहीं रहा। ऐसा भी कहा जाता है कि बचपन में उसने ही युधिष्ठिर को ये सूचना दी थी कि दुर्योधन ने भीम के भोजन में विष मिला दिया है। द्यूतभवन में भी उसने विकर्ण के साथ चीरहरण का पुरजोर विरोध किया था किन्तु दोनों की बातें किसी ने नहीं सुनी।
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