Adivasi Samaj Kranti: आदिवासी समाज की ऐतिहासिक पहल परंपरा और आधुनिकता के संगम से जन्मा सामाजिक क्रांति का जन आंदोलन
बांसवाड़ा (दक्षिण राजस्थान)।: दक्षिण राजस्थान के आदिवासी अंचल में एक ऐसी सामाजिक क्रांति आकार ले रही है, जो न केवल परंपराओं की रक्षा कर रही है, बल्कि आधुनिक समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौतियों—नशा, फिजूलखर्ची, कुरीतियां और सामाजिक विघटन—का भी सशक्त समाधान प्रस्तुत कर रही है। यह पहल किसी सरकारी आदेश या राजनीतिक एजेंडे से नहीं, बल्कि समुदाय की सामूहिक चेतना से जन्मी है।
इस परिवर्तन की धुरी बनी है वागधारा द्वारा गठित कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठन, जिनके माध्यम से आदिवासी समाज ने स्वयं अपने भविष्य की दिशा तय करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है।
गांव-गांव उठी बदलाव की आवाज
34 ग्राम पंचायतों से 95 गांवों तक फैला जन आंदोलन
आनंदपुरी उपखंड की 34 ग्राम पंचायतों से लेकर गांगड़तलाई पंचायत समिति क्षेत्र के 95 गांवों तक आयोजित बैठकों में सैकड़ों नहीं, बल्कि हजारों समाजजनों ने भाग लेकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि अब आदिवासी समाज अपनी सामाजिक व्यवस्था को खुद सुधारेगा।
ये बैठकें केवल औपचारिक चर्चाएं नहीं रहीं, बल्कि एक जन आंदोलन का रूप ले चुकी हैं—जहां हर व्यक्ति बदलाव का भागीदार है।
छाजा पंचायत भवन से उठा सख्त संदेश
डीजे, दहेज और नशे पर पूर्ण प्रतिबंध आनंदपुरी तहसील के छाजा पंचायत भवन में आयोजित ऐतिहासिक बैठक में जेतियावाड़ा, कथिरिया, भोजेला, कोबा, डमइारा, बोरी, नवाटापरा, बरकोटा सहित कई गांवों के प्रतिनिधियों ने एकमत से कठोर सामाजिक निर्णय लिए—
किसी भी सामाजिक आयोजन में डीजे पूरी तरह प्रतिबंधित
दहेज प्रथा पर पूर्ण रोक
किसी भी प्रकार के नशे की अनुमति नहीं
इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए हर गांव में पांच सदस्यीय अनुशासन समिति का गठन किया गया है, जो उल्लंघन की स्थिति में सख्त कार्रवाई करेगी। कुशलीपाड़ा बैठक में और कठोर फैसले डीजे बजाया तो 51 हजार का जुर्माना
सज्जनगढ़ तहसील के वांकाखूटा (कुशलीपाड़ा) गांव में हुई बैठक में समाज ने और भी सख्त रुख अपनाया—
डीजे बजाने पर ₹51,000 का जुर्माना शराब पीकर आयोजन में आने वाले व्यक्ति पर सामाजिक दंड शराब व डीजे संस्कृति को समाज के लिए घातक घोषित, यह फैसला केवल नियम नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के आत्मसम्मान की घोषणा है। नशे के खिलाफ निर्णायक युद्ध युवा पीढ़ी को बचाने की सामूहिक पहल आदिवासी समाज में नशा एक गंभीर सामाजिक संकट बन चुका था। इसे जड़ से खत्म करने के लिए समाज ने ऐतिहासिक फैसला लिया—
सभी आयोजनों में दारू, बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू, गुटखा, पान-मसाला पूर्ण प्रतिबंध धूम्रपान और मद्यपान पर संपूर्ण रोक
18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नशामुक्त रखना अनिवार्य
गांव में शराब बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध साथ ही युवाओं को खेल, शिक्षा और रोजगार की ओर प्रेरित करने का सामूहिक संकल्प लिया गया।
शादी-विवाह में सादगी का संकल्प दिखावे से मुक्ति, कर्ज से आज़ादी आधुनिकता की दौड़ में विवाह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था। इसे रोकने के लिए समाज ने क्रांतिकारी फैसले लिए—
कन्यादान केवल माता-पिता द्वारा भोजन शुद्ध शाकाहारी (दाल-चावल-लापसी) बारात में एक बस + एक गाड़ी
एक घर से केवल एक व्यक्ति नोतरा बारात सुबह 9 से शाम 6 बजे तक यह निर्णय सामाजिक समानता और आर्थिक संतुलन की दिशा में बड़ा कदम है। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की वापसी संस्कृति भी बचे, खर्च भी घटे गांगड़तलाई तहसील के गणेशपुरा, भीतपाड़ा और भेदीपाड़ा की संयुक्त बैठक में निर्णय लिया गया कि—
डीजे की जगह पारंपरिक वाद्य यंत्र सस्ता, सम्मानजनक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला विकल्प
मृत्यु भोज और कफन प्रथा में सुधार समाज ने मृत्यु संस्कारों में भी सुधार के साहसिक निर्णय लिए—
पीहर पक्ष और घर से एक-एक कफन तोलिया प्रथा समाप्त
जमाई केवल एक पोत ममेरा प्रथा केवल मामा द्वारा
विवाह के बाद माता-पिता से एक ही ममेरा महिलाओं की बराबरी की भागीदारी बिना महिलाओं के नहीं होगा विकास
कृषि एवं आदिवासी स्वराज संगठनों में महिलाओं की समान भागीदारी सुनिश्चित की गई है।
बैठकों में यह स्पष्ट किया गया कि—
“जब महिलाएं निर्णय प्रक्रिया में होंगी, तभी समाज सशक्त बनेगा।”
सामाजिक अपराधों पर कड़ा प्रहारबहिष्कार और लाखों का जुर्माना समाज ने अपराधों पर शून्य सहनशीलता नीति अपनाई—
महिला/लड़की के साथ अपराध → समाज से निष्कासन
गांव/गोत्र में नातरा → ₹5 लाख जुर्माना + बहिष्कार
विवाहित द्वारा नातरा → ₹5 लाख + गांव से बाहर
नाबालिक नातरा → परिवार को सुपुर्द
पंच-पंचायत व्यवस्था का पुनर्जागरण महंगे और जटिल न्यायिक सिस्टम से बचने के लिए समाज ने
पारंपरिक पंचायत व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का फैसला किया।
चुनाव में शराब-पैसे पर ऐतिहासिक फैसला बैठक में लिया गया सबसे साहसिक निर्णय—
“जो पार्टी या प्रत्याशी शराब या पैसा बांटेगा, आदिवासी समाज उसे वोट नहीं देगा।” यह लोकतंत्र को स्वच्छ बनाने की दिशा में क्रांतिकारी पहल है।
वर्ष में दो बार अनिवार्य समाज सुधार बैठक नियमों की समीक्षा संशोधन गांव-गांव जागरूकता अभियान
आंगनवाड़ी, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र की निगरानी
सरकार और समाज के बीच सेतु बना वागधारा, वागधारा संगठन ने समुदाय को यह अहसास कराया कि—
“बदलाव बाहर से नहीं, भीतर से आता है।” समर्पित पदाधिकारियों की ऐतिहासिक भूमिका राम सिंह से लेकर हिरालाल तक, सैकड़ों पदाधिकारियों ने घर-घर जाकर समाज को जोड़ा, समझाया और प्रेरित किया। एक नई शुरुआत की कहानी यह केवल कुछ गांवों की कहानी नहीं, यह उस भारत की कहानी है— जो नशामुक्त है जो आत्मनिर्भर है जो अपनी संस्कृति पर गर्व करता है आदिवासी समाज ने साबित कर दिया है— परिवर्तन संभव है।
